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गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

"संसद का शैतान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बेचारों के चारे को वो पचा न पाया।
संसद का शैतान स्वयं को बचा न पाया।।

माना थे हम मूक, मगर आहें थीं मोटी,
लगी उसे ही, जिसने छीनी अपनी रोटी,
रास महल में रहने वाला, रचा न पाया।
संसद का शैतान स्वयं को बचा न पाया।।

नहीं हमेशा अनाचार-अन्याय फलेगा,
हमको था विश्वास, कभी तो न्याय मिलेगा,
संविधान को कुशल मदारी, नचा न पाया।
संसद का शैतान स्वयं को बचा न पाया।।

उसकी लाठी में कोई आवाज नहीं थी,
न्याय-व्यवस्था थी, जंगल का राज नहीं थी,
मार पड़ी तो शोर जरा भी मचा न पाया।
संसद का शैतान स्वयं को बचा न पाया।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 04/10/2013 को
    कण कण में बसी है माँ
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः29
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति, आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04-10-2013) को " लोग जान जायेंगे (चर्चा -1388)
    "
    पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. जैसा खाया, वैसा पाया,
    सम्मानों की बलि दे आया।

    उत्तर देंहटाएं


  4. ☆★☆★☆


    नहीं हमेशा अनाचार-अन्याय फलेगा,
    हमको था विश्वास, कभी तो न्याय मिलेगा,
    संविधान को कुशल मदारी, नचा न पाया।
    संसद का शैतान स्वयं को बचा न पाया।।

    वाऽहऽऽ…!

    इस शैतान से बड़े और भी बहुत सारे शैतान और डायनें हैं अभी सलाखों के पीछे भेजे जाने के लिए...
    सुंदर सामयिक निर्भीक ईमानदार रचना के लिए आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी
    आपके प्रति हृदय से साधुवाद !
    सुंदर रचना के लिए बधाई !
    आपकी लेखनी से सदैव सुंदर श्रेष्ठ सार्थक सृजन होता रहे...

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  5. हाहाहा बहुत सही कटाक्ष किया है शास्त्री जी ,किन्तु वो चुप नहीं है छटपटा रहा है सुप्रीमकोर्ट जाएगा ,ये सियासती हथकंडे और इनकी माया !!! इस बढ़िया पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई सादर

    उत्तर देंहटाएं

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