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रविवार, 20 अक्तूबर 2013

“आँसू का अस्तित्व सागर से कम नहीं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जब आता है दुःख तभी,

लोचन तन-मन धोता है।
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।।

हार नही मानी जिसने,
बहती नदियों-नहरों से,
जल को लिया समेट स्वयं,
गिरती-उठती लहरों से,
रत्न वही पाता है जो, 
मंथक सक्षम होता है। 
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।।  


जो फूलों के संग काँटों को,
सहन किये जाता है,
जो अमृत के साथ गरल का,
घूँट पिये जाता है,
शीत, ग्रीष्म और वर्षा में,
वो नहीं असम होता है। 
आँसू का अस्तित्व,
नहीं सागर से कम होता है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [21.10.2013]
    चर्चामंच 1405 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर एहसासात की पोस्ट सशक्त सन्देश देती हुई जीवन के संघर्षों के प्रति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-22/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -32 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

    उत्तर देंहटाएं
  4. ---क्या बात है ..उत्तम ...

    अश्रु उनके हों या अपने अश्रु होते हैं |
    कष्ट में अश्रु आनंद में प्रेमाश्रु होते हैं|

    उत्तर देंहटाएं

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