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रविवार, 27 अक्तूबर 2013

"दोहे-प्रीत मुक्त आभास" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रेम शब्द में निहित है, दुनियाभर का सार।
ढाई आखर प्यार का, समझो मत व्यापार।१।
--
प्यार न बन्धन में बँधे, माने नहीं रिवाज।
प्रीत मुक्त आभास है, चाहत की परवाज।२।
--
दिल में सख्त पहाड़ के, पानी का है सोत।
कोने में दिल के कहीं, जलती इसकी जोत।३।
--
प्यार छलकता जाम है, खिलता हुआ पलाश।
चाहे जितना भी पियो, बुझती कभी न प्यास।४।
--
प्यार नहीं है वासना, ये है पूजा-जाप।
मक्कारों के वास्ते, प्यार एक अभिशाप।५।
--
बात-चीत से शीघ्र ही, मन की खाई पाट।
टूटा दिल जुड़ता नहीं, पड़ जाती है गाँठ।६।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    शुभकामनायें आदरणीय-

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 28/10/2013 कोकुछ पंखतियों के साथ नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्यार छलकता जाम है, खिलता हुआ पलाश।
    चाहे जितना भी पियो, बुझती कभी न प्यास ..

    उत्तम, अती उत्तम ... सभी दोहे दिल में उतर जाते हैं ... प्रेम का रस छलका रहे हैं सब ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. प्यार नहीं है वासना, ये है पूजा-जाप।
    मक्कारों के वास्ते, प्यार एक अभिशाप।
    बहुत सुंदर दोहे ,,,

    RECENT POST -: तुलसी बिन सून लगे अंगना

    उत्तर देंहटाएं
  5. guru ji pranaam
    bahut sunder prastuti
    नमस्कार !
    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [28.10.2013]
    चर्चामंच 1412 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्यार न बन्धन में बँधे, माने नहीं रिवाज।
    प्रीत मुक्त आभास है, चाहत की परवाज

    बिना प्यार के आदमी रहता है मोहताज़ ,
    प्रेम की पाटी जो पढ़े उसके सिर पे ताज।

    सुन्दर अर्थ और भाव है शास्त्री दोहावली का।

    उत्तर देंहटाएं
  7. aapke dohe padh ke mujhe kabir das ji ki yaad aatee hai, wo bhee aise hee meethe dohe likha karte thay.

    उत्तर देंहटाएं

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