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बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

"ज़िन्दग़ी नरक बन गयी है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पतली गली अब सड़क बन गई है।
नाजुक लता अब कड़क बन गई है।।

इंसानियत आज आँसू बहाती,
हैवानियत अब हड़क बन गई है।

दिखाई नही दे रही सादगी अब,
पौशाक में अब भड़क बन गई है।

जुगाड़ों में गुम हो गई प्राञ्जलता,
सिफारिस भी सीधे मड़क बन गई है।

जहाँ न्याय, अन्याय पर ही टिका हो,
वो आजादी बेड़ा-गड़क बन गई है।

सियासत का बिगड़ा हुआ “रूप” देखो,
यहाँ ज़िन्दग़ी अब नरक बन गयी है।

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

    उत्तर देंहटाएं
  2. इमानदारी के रस्ते पर हैं हजारों गड्ढ़े, सिफारिस के रास्तों की सड़क बन गयी है ,सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सशक्त भाव अभिव्यक्ति अर्थगर्भित।

    उत्तर देंहटाएं

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