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सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

"टोपी-कठिन पहेली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जूती-टोपी बनी सहेली।
सुलझ न पाये कठिन पहेली।।

कर्णधार को रास न आया,
टोपी को उसने बिसराया।
टोपी होती एक झमेला,
कहता गांधी जी का चेला।
मैं आजादी का उन्मादी,
उसने सदा गुलामी झेली।
सुलझ न पाये कठिन पहेली।।

मैं कैसे टोपी अपनाता,
जगह-जगह हूँ जूते खाता।
टोपी शुचिता की पहचान,
टोपी है भारत की शान।
इसीलिए मैं नहीं पहनता,
जिससे टोपी रहे नवेली।
सुलझ न पाये कठिन पहेली।।

मैं गड़बड़-घोटाला करता,
रिश्वत से अपना घर भरता।
मेरी सुख-सुविधा सरकारी,
कुर्सी से है नातेदारी।
वोट-नोट के लिए हमेशा,
खुल जाती हैं बँधी हथेली।
सुलझ न पाये कठिन पहेली।।

तन भी काला, मन भी काला,
रोज निगलता नर्म निवाला।
साँठ-गाठ करके गैरों से,
पीट रहा घर का दीवाला।
माना उजड़ गये रजवाड़े,
मेरी है आबाद हवेली।।
सुलझ न पाये कठिन पहेली।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति-
    नवरात्रि की मंगल कामनाएं-
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्तर
    1. waah waah kya baat hai , sundar geet ,bahut sundar , sarthak post , badhai aapko

      हटाएं
  3. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ८ /१०/१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहा आपने अब तो असली टोपी पहनने वाला कोई नहीं ..अब तो टोपी पहनाने वालों की भरमार हैं ...
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  5. टोपी में ये पाल रहे हैं, काले धन के तोते।

    उत्तर देंहटाएं

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