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मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

"करवाचौथ-चार दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरे माता-पिता जी, रहते मेरे साथ।
मेरे सिर पर सदा ही, रहता उनका हाथ।१।
माता जी सिखला रही, बहुओं को सब ढंग।
होते हर त्यौहार के, अपने-अपने रंग।२।
करवा पूजन की कथा, माता रहीं सुनाय।
वंशबेल को देखकर, फूली नहीं समाय।३।
जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग।
बेटों-बहुओं में रहे, प्रीत और अनुराग।४।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आप बहुत सौभाग्यशाली हैं ! माता जी को हमारा प्रणाम ! सुंदर प्रस्तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  2. गुरु जी यह क्या ???
    किसकी छलनी में नजर आने लगे
    हाहाहा

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह रचना आज बुधवार (23-10-2013) को ब्लॉग प्रसारण : 154 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.
    एक नजर मेरे अंगना में ...
    ''गुज़ारिश''
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं

  4. जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग।
    बेटों-बहुओं में रहे, प्रीत और अनुराग।४।

    अति सुन्दर सार्थक सन्देश। सौभाग्य माँ बाप के साथ रहने का। उनका आशीष लेते रहने का।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सरिता जी।
    छलनी भी अपनी है और छलनीवाली भी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. करवा पूजन की कथा, माता रहीं सुनाय।
    वंशबेल को देखकर, फूली नहीं समाय------

    सुंदर और सार्थक दोहे
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

    आग्रह है---
    करवा चौथ का चाँद ------

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर सार्थक दोहे ...
    जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग।
    बेटों-बहुओं में रहे, प्रीत और अनुराग।........बहुत सुन्दर !!
    सादर

    उत्तर देंहटाएं

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