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बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

"दिल की आग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सवाल पर सवाल हैं, कुछ नहीं जवाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

गीत भी डरे हुए, ताल-लय उदास हैं.
पात भी झरे हुए, शेष चन्द श्वास हैं,
दो नयन में पल रहा, नग़मग़ी सा ख्वाब है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

ज़िन्दगी है इक सफर, पथ नहीं सरल यहाँ,
मंजिलों को खोजता, पथिक यहाँ-कभी वहाँ,
रंग भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु नहीं फाग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

बाट जोहती रहीं, डोलियाँ सजी हुई,
हाथ की हथेलियों में, मेंहदी रची हुई,
हैं सिंगार साथ में, पर नहीं सुहाग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

इस अँधेरी रात में, जुगनुओं की भीड़ है,
अजनबी तलाशता, सिर्फ एक नीड़ है,
रौशनी के वास्ते, जल रहा च़िराग है।
राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. इस अँधेरी रात में, जुगनुओं की भीड़ है,
    अजनबी तलाशता, सिर्फ एक नीड़ है,
    रौशनी के वास्ते, जल रहा च़िराग है।
    राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।
    बहुत सुंदर .

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :-24/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -33 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है....................
    जिंदगी के भावों को प्रदर्शित करती सुन्दर रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (24-10-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 155" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही उम्दा प्रस्तुति
    हमारे दिल की आग

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्राञ्जल प्रवाह-पूर्ण प्रशंसनीय प्रस्तुति । बधाई ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. वयस्कों की पी़डा का सही चित्रण। बढिया प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं

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