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शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

"दोहे-माता का आशीष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जिसके सिर पर हो सदा, माता का आशीष।
वो ही तो कहलायगा, वाणी का वागीश।१।

लेखन करती मातु हैं, मैं हूँ मात्र निमित्त।
माता अपने दास का, करना पावन चित्त।२।

मुझ पर माता शारदे, करना यह उपकार।
जीवनभर सुनता रहूँ, वीणा की झंकार।३।

जो अपने अज्ञान का, करते हैं गुण-गान।
उनका विज्ञ समाज में, होता है अपमान।४।

ज्ञानी-सज्जनवृन्द का, हो आदर-सत्कार।
अभिमानी के सामने, कभी न मानूँ हार।५।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर दोहे ...
    जय माता दी...:-)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर दोहे.....
    माँ की कृपा हम सभी पर बनी रहे.
    नवरात्र की शुभकामनाएं.

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 04.10.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेहद प्रांजल रचना गंगाजल सी पावन धारा और प्रवाह लिए निष्कलुष मन का।

    उत्तर देंहटाएं
  5. नमस्कार आपकी यह रचना कल शनिवार (05-10-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    उत्तर देंहटाएं
  6. माँ सरस्वती के गुणगान स्वरूप सुंदर दोहे।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर प्रस्तुति
    शुभकामनायें आदरणीय ||
    नवरात्रि की शुभकामनायें-

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह कितने सुन्दर दोहे .. माँ को समर्पित .. हार्दिक शुभकामनायें ..

    उत्तर देंहटाएं

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