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शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

"भविष्य को सँवार लो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नवल नीर बह रहा, मैल तो उतार लो।
वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।

रश्मियाँ जवान हैं, हो रहा विहान है,
कुछ समय के बाद तो, ढलान ही ढलान हैं,
चार दिन की चाँदनी के बाद, अन्धकार है,
जीत में छिपी हुई, जिन्दगी की हार है,
तापमान कह रहा, सोच लो-विचार लो।
वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।

मत करो कुतर्क को, सत्य स्वयंसिद्ध है,
मन को साफ कीजिए, पथ नहीं विरुद्ध है,
धर्म, प्रान्त-जाति के, बन्द अब विवाद हों,
मनुजता के नीड़ से, दूर सब विषाद हों,
स्वाभिमान कह रहा, दम्भ मत उधार लो।
वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।

पंक में खिला कमल, किन्तु है अमल-धवल,
चोटियों से शैल की, हिम रहा सतत पिघल,
जो धरा के प्राणियों की, प्यास को मिटा रहा,
चाँद आपनी चाँदनी से, ताप को घटा रहा,
वाटिका का हर सुमन, गन्ध को लुटा रहा,
संविधान कह रहा, प्यार से पुकार लो।
वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........
    नवल नीर बह रहा, मैल तो उतार लो।
    वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।
    शनिवार 12/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही खूब .. सुंदर गीत के सृजन के हेतु शुभकामनाएं ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. वर्तमान भविष्य को सँवारने का कार्य करे।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Sundar post hamare blog par bhi aakar apni ray de technik ki duniya next post PDF CONVERTER

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर गीत सृजन के लिए बधाई ..!
    नवरात्रि की शुभकामनाएँ ...!

    RECENT POST : अपनी राम कहानी में.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब आचार्य जी,वर्तमान ही भविष्य कों बना रहा हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  7. मत करो कुतर्क को, सत्य स्वयंसिद्ध है,
    मन को साफ कीजिए, पथ नहीं विरुद्ध है,
    धर्म, प्रान्त-जाति के, बन्द अब विवाद हों,
    मनुजता के नीड़ से, दूर सब विषाद हों,
    स्वाभिमान कह रहा, दम्भ मत उधार लो।
    वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।
    आदरणीय शास्त्री जी ..बहुत सुन्दर सीख देती उत्साह बढाती रचना ... काविले तारीफ़ ..बधाई

    नवरात्रि की शुभकामनाएँ ...
    भ्रमर५

    उत्तर देंहटाएं
  8. आज की विशेष बुलेटिन जेपी और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो..बहुत सुंदर गीत

    उत्तर देंहटाएं
  10. पंक में खिला कमल, किन्तु है अमल-धवल,
    चोटियों से शैल की, हिम रहा सतत पिघल,
    जो धरा के प्राणियों की, प्यास को मिटा रहा,
    चाँद आपनी चाँदनी से, ताप को घटा रहा,
    वाटिका का हर सुमन, गन्ध को लुटा रहा,
    संविधान कह रहा, प्यार से पुकार लो।
    वर्तमान कह रहा, भविष्य को सँवार लो।।

    सुन्दर मनोहर। अप्रतिम प्रस्तुति प्रांजल अर्थ और भाव लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  11. पंक में खिला कमल, किन्तु है अमल-धवल,
    चोटियों से शैल की, हिम रहा सतत पिघल,
    जो धरा के प्राणियों की, प्यास को मिटा रहा,
    चाँद आपनी चाँदनी से, ताप को घटा रहा,
    वाटिका का हर सुमन, गन्ध को लुटा रहा,
    सुंदर सृजन .

    उत्तर देंहटाएं
  12. धर्म, प्रान्त-जाति के, बन्द अब विवाद हों,
    मनुजता के नीड़ से, दूर सब विषाद हों,

    जन जन को जाग्रत करने वाली पंक्तियाँ .......

    सशक्त सृजन ... आभार शास्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं

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