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बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

"जीवन जटिल जलेबी जैसा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शब्दों का भण्डार नहीं है, फिर भी कलम चलाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

रूपनहीं है, रंग नहीं है,
भाव नहीं है, छन्द नहीं है।
कागज के कृत्रिम फूलों में,
कोई गन्ध-सुगन्ध नहीं है।
आड़ी-तिरछी रेखाओं से, अपनी फसल उगाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

सिद्ध नहीं हूँ, सिद्धि नहीं है,
मस्तक तो है, बुद्धि नहीं है।
मिली मुझे बंजर वसुधा है,
जीवन तो है, ऋद्धि नहीं है।
अँखियों के खारे पानी को, मुखड़े पर ढलकाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

भूखा सारा कुटुम-कबीला,
कंगाली में आटा गीला।
कालचक्र है जटिल जलेबी,
धरती के ऊपर नभ नीला।
झंझावातों की चक्की में, मैं तो पिसता जाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

मैं हूँ साधक तेरा माता,
तन-मन से तेरा उद्गाता।
आया हूँ मैं द्वारे तेरे,
दूर करो अब संकट मेरे।
तेरे चरणों में माता, मैं अपना शीश नवाता हूँ।
कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. गुनगुनाहट लिए छंद बढ अप्रतिम रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदरणीय शास्त्री साहब प्रणाम, यदि कोरे पन्नों को काला करना इतना अच्छा है तो फिर रचना करना किसे कहेंगे , बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ उकेरी हैं आपने आपको अनेकों बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. गज़ब का रस है इस सुन्दर रचना में ...
    नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. बड़े ही सुन्दर ढंग से मन के भाव व्यक्त किये हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. तेरे चरणों में माता, मैं अपना शीश नवाता हूँ।
    कोरे पन्नों को स्याही से, काला ही कर पाता हूँ।।
    waah bahut sundar!

    उत्तर देंहटाएं

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