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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

"दोहे-फेसबुक और ब्लॉगिंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

फेसबुक्क पर आ गये, अब तो सारे मित्र।
हिन्दी ब्लॉगिंग की हुई, हालत बहुत विचित्र।।

लगा रहे हैं सब यहाँ, अपने मन के चित्र।
अच्छे-अच्छों का हुआ, दूषित यहाँ चरित्र।।

बेगाने भी कर रहे, अपनेपन से बात।
अपने-अपने ढंग से, मचा रहे उत्पात।।

लेकिन ब्लॉगिंग में नहीं, फेसबुकी आनन्द।
बतियाने के रास्ते, वहाँ सभी हैं बन्द।।

लिखते ही पाओ यहाँ, टिप्पणियाँ तत्काल।
टिप्पणियों को तरसते, ब्लॉग हुए बेहाल।।
--
ब्लॉक न होता है कभी, ब्लॉगिंग का संसार।
धैर्य और गम्भीरता, ब्लॉगिंग का आधार।।

ब्लगिंग देता वो मज़ा, जैसा दे सत्संग।
यहाँ डोर मजबूत है, ऊँची उड़े पतंग।।

इन्द्रधनुष से हैं यहाँ, प्यारे-प्यारे रंग।
ब्लॉगिंग में चलते नहीं, नंगे और निहंग।।

लेख और रचनाओं को, गूगल रहा सहेज।
समझदार करते नहीं, ब्ल़गिंग से परहेज।।

भले चलाओ फेसबुक, ओ ब्लॉगिंग के सन्त।
मगर ब्लॉग का क्षेत्र वो, जिसका आदि न अन्त।।

पहले लिक्खो ब्लॉग में, रचनाएँ-आलेख।
ब्लॉगिंग के पश्चात ही, फेसबुक्क को देख।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khoob par blogging me jo garima hai -vivasniyta hai facebook par nahi .

    उत्तर देंहटाएं
  2. सटीक !
    ब्लागर बड़ा कंजूस होता है
    फेसबुकिया देख तो देता है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. ब्लॉक न होता है कभी,ब्लॉगिंग का संसार।
    धैर्य और गम्भीरता, ब्लॉगिंग का आधार।।

    पहले लिक्खो ब्लॉग में, रचनाएँ-आलेख।
    ब्लॉगिंग के पश्चात ही, फेसबुक्क को देख।।

    मुझे तो फेस बुक रास ही नही आता ,,,,

    RECENT POST -: हमने कितना प्यार किया था.


    उत्तर देंहटाएं
  4. फेसबूक्क दो शब्द है, ब्लागिंग बुद्धि विलास|
    यह सबके बस की कहाँ, कहाँ मिले अवकाश||
    किन्तु पूर्ण सहमति मेरी, तुम हो अग्रज भ्रात|
    अतः मानता हूँ सभी, हे मेरे प्रिय तात||
    आत्मा को मिलता वहाँ, यहाँ ह्रदय को ठौर|
    गंधहीन वह कमल है, यह है मादक बौर||
    शहरी भागमभाग यह, वह है ठहरा गाँव|
    सुख मिलता है पर मुझे फेसबूक्क की छांव||

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. रोवे बुक्का फाड़ के, कहीं हंसी बेजोड़ |
      टांग खिंचाई हो कहीं, बाहें कहीं मरोड़ |
      बाहें कहीं मरोड़ , फेस करते हैं सुख दुःख |
      जीवन के दो फेस, जानिये ब्लॉगर का रुख |
      काटे चुटकी एक, रीति को दूजा ढोवे-
      नहीं तवज्जो पाय, किन्तु ये दोनों रोवे ||

      हटाएं
  5. वाह्ह्ह्हह्ह्ह बहुत बढ़िया सामयिक दोहे मजा आ गया पढ़ के...घोर समस्या छाई ....बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब.. मजा आ गया.. सुंदर और सामयिक प्रस्तुति..
    prathamprayaas.blogspot.in-

    उत्तर देंहटाएं
  7. पहले लिक्खो ब्लॉग में, रचनाएँ-आलेख।
    ब्लॉगिंग के पश्चात ही, फेसबुक्क को देख।।
    क्या सुंदर बात कही है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर आकलन और अभिव्यक्ति..

    उत्तर देंहटाएं

  9. इन्द्रधनुष से हैं यहाँ, प्यारे-प्यारे रंग।
    ब्लॉगिंग में चलते नहीं, नंगे और निहंग।।




    इन्द्रधनुष से हैं यहाँ, प्यारे-प्यारे रंग।
    ब्लॉगिंग में चलते नहीं, नंगे और निहंग।।

    मुख चिठ्ठा की का कहें मार्फिंग का है जोर ,

    चेहरा याँ किसी अउर का ,अनघ अंग कछु और।

    बढ़िया काव्यात्मक अध्ययन दोनों का।

    दोनों हैं पूरक मगर नहीं परस्पर वैर

    चिठ्ठा मुख पर पूछते सब अपनों की खैर।

    बढ़िया प्रस्तुति शाष्त्री जी।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (26-10-2013) "ख़ुद अपना आकाश रचो तुम" चर्चामंच : चर्चा अंक -1410 पर होगी !
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
  11. नेक ओर सच्ची सलाह के लिए आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

    उत्तर देंहटाएं

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