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शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

"भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



मुखौटे राम के पहने हुए, रावण जमाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर, लगे खाने-कमाने में।।

दया के द्वार पर, बैठे हुए हैं लोभ के पहरे, 
मिटी सम्वेदना सारी, मनुज के स्रोत है बहरे, 
सियासत के भिखारी व्यस्त हैं कुर्सी बचाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

जो सदियों से नही सी पाये, अपने चाकदामन को, 
छुरा ले चल पड़े हैं हाथ वो, अब काटने तन को, 
वो रहते भव्य भवनों में, कभी थे जो विराने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

युवक मजबूर होकर खींचते हैं रात-दिन रिक्शा, 
मगर कुत्ते और बिल्ले कर रहें हैं दूध की रक्षा, 
श्रमिक का हो रहा शोषण, धनिक के कारखाने में। 
लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।
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7 टिप्‍पणियां:

  1. अत्यंत सशक्त अभिव्यक्ति है। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मैंने भी कोशिश की आज कुर्सी को लेकर पर नहीं कह पाया
    मेरे मन की बात तो आपका बस शीर्षक ही बताने है आया !

    उत्तर देंहटाएं
  3. युवक मजबूर होकर खींचते हैं रात-दिन रिक्शा,
    मगर कुत्ते और बिल्ले कर रहें हैं दूध की रक्षा,
    श्रमिक का हो रहा शोषण, धनिक के कारखाने में।
    लुटेरे ओढ़ पीताम्बर लगे खाने-कमाने में।।

    मगर कुत्ते 'औ' बिल्ले कर रहें हैं दुग्ध की रक्षा,

    सुन्दर प्रस्तुति।
    सफर करते हैं लेकर नाम दादी और पापा का ,

    वो मजमा रोज़ करते हैं खुद अपने आजमाने का।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर प्रस्तुति।
    सफर करते हैं लेकर नाम दादी और पापा का ,

    वो मजमा रोज़ यूं करते हैं खुद को आजमाने का।

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

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