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मंगलवार, 15 अक्तूबर 2013

"झुकेगी कमर धीरे-धीरे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
जवानी ढलेगी मगर धीरे-धीरे
करेगा बुढ़ापा असर धीरे-धीरे

सहारा छड़ी का ही लेना पड़ेगा
झुकेगी सभी की कमर धीरे-धीरे

आँखों पे चश्मा लगाना पड़ेगा
कमजोर होगी नजर धीरे-धीरे

नहीं साथ देगा कुटुम और कबीला
कठिन सी लगेगी डगर धीरे-धीरे

यही फलसफा जिन्दगी का है यारों
कटेगी अकेले उमर धीरे-धीरे

नहीं “रूप” की धूप हरदम खिलेगी
       अँधेरे  में  होगा सफर धीरे-धीरे  

17 टिप्‍पणियां:

  1. “रूप” की धूप हरदम नहीं साथ देगी
    अन्धेरों में होगा सफर धीरे-धीरे

    उत्तर देंहटाएं
  2. सब कुछ धीरे धीरे हो तो ही अच्छा है...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. हमेशा धीरे धीरे कुछ भी होना अच्छा नहीं माना जाता और किसी को अपना काम धीरे धीरे हो ये अच्छा भी नहीं लगता

      हटाएं
  3. आदरणीय शास्त्री जी प्रणाम, इस जीवन में आकर देरी से जुड़ने वाला जीवन साथी का रिश्ता ही सबसे देरी तक साथ निभाता है। फिर अकेले रह जाने पर

    जीवन साथी की याद में
    सिसकियां भरेंगे धीरे धीरे

    आपको सुन्दर रचना के लिए बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब !
    हमें भी दिख रही है कमर धीरे धीरे !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बेहतरीन ग़ज़ल लिखी है शास्त्री जी...

    उत्तर देंहटाएं
  6. यही फलसफा जिन्दगी का बना है
    कटेगी ये लम्बी उमर धीरे - धीरे,,,,

    बेहतरीन ग़ज़ल...!

    उत्तर देंहटाएं
  7. कुछ जल्दी नहीं होगा क्या

    उत्तर देंहटाएं
  8. जिंदगी का फलसफा तो यही है , सादर .

    उत्तर देंहटाएं
  9. नहीं साथ देगा कुटुम और कबीला
    कठिन सी लगेगी डगर धीरे-धीरे

    यही फलसफा जिन्दगी का है यारों
    कटेगी अकेले उमर धीरे-धीरे

    नहीं “रूप” की धूप हरदम खिलेगी
    अँधेरे में होगा सफर धीरे-धीरे
    बहुत खूब कहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा 17-10-2013 को
    चर्चा मंच
    पर है ।
    कृपया पधारें
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  11. इस पोस्ट की चर्चा, बृहस्पतिवार, दिनांक :-17/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -26 पर.
    आप भी पधारें, सादर ....

    उत्तर देंहटाएं
  12. जीवन का फलसफा .. समझेगे लोग ...मगर धीरे धीरे ... :) उम्दा रचना .. सादर नमन ..

    नहीं साथ देगा कुटुम और कबीला
    कठिन सी लगेगी डगर धीरे-धीरे

    यही फलसफा जिन्दगी का है यारों
    कटेगी अकेले उमर धीरे-धीरे

    नहीं “रूप” की धूप हरदम खिलेगी
    अँधेरे में होगा सफर धीरे-धीरे

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह वाह ... बहुत ही लाजवाब .... जीवन का फलसफा लिख डाला ...
    राम राम शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं

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