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रविवार, 12 जनवरी 2014

"पन्नियाँ बीन रहा है बचपन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कुहासे की सफेद चादर
मौसम ने ओढ़ ली
ठिठुरन से मित्रता
भास्कर ने जोड़़ ली
निर्धनता
खोज रही है
आग के अलाव
किन्तु
लकड़ियों के
ऊँचे हैं भाव
ठण्ड से काँप रहा है
कोमल तन
कूड़े में से पन्नियाँ
बीन रहा है बचपन
इसके बाद
वो इन्हें
बाजार में बेचेगा
फिर जंगल में जाकर
लकड़िया बीनेगा
तब कहीं
उसके घर में
चूल्हा जलेगा
पेट की आग तो
बुझ जायेगी
मगर बदन तो
ठण्डा ही रहेगा
थोड़े दिन में
कुहरा छँट जायेगा
सूरज अपने
असली रूप में आयेगा
फिर छायेगी
होली की मस्ती
दिन मे आयेगी
तन में सुस्ती
सर्दी में कम्पन
गर्मी में पसीना
सहना मजबूरी है
क्योंकि
दाल-रोटी का
जुगाड़ भी तो
जरूरी है
इसी का नाम जीवन है?
बूढ़ा हो रहा बचपन है?

3 टिप्‍पणियां:

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