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बुधवार, 8 जनवरी 2014

"सुन्दर विमल-वितान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मन और सुमन हमेशा गायें, अभिनव मंगल गान।
अपनी कुटिया बन जाएगी, सुन्दर विमल-वितान।।

उगें नये पौधे बगिया में, मिले खाद और पानी,
शिक्षा के भण्डार भरे हों, नर-नारी हों ज्ञानी,
तुलसी, सूर, कबीर सुनाएँ, राम कृष्ण की तान।
अपनी कुटिया बन जाएगी, सुन्दर विमल-वितान।।

ललनाएँ सीता जैसी हों, भरत-लखन से भाई हों,
वीर शिवा जैसे प्रसून हों, कलियाँ लक्ष्मीबाई हों,
आजादी के परवानों का, गाँव-नगर में हो सम्मान।
अपनी कुटिया बन जाएगी, सुन्दर विमल-वितान।।

चिंगारी आतंकवाद की, कहीं भड़कने ना पायें,
गद्दारी अलगाववाद की, नहीं धड़कने आ पायें,
इन्सानों की बस्ती में, अब नही पलने पाये शैतान।
अपनी कुटिया बन जाएगी, सुन्दर विमल-वितान।।

सुख का सूरज सजे गगन में, बादल अमृत बरसायें,
विश्व गुरू बनकर हम जग को, पावन पथ दिखलायें,
तब सचमुच ही कहलाएगा, मेरा भारत देश महान।
अपनी कुटिया बन जाएगी, सुन्दर विमल-वितान।।

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी प्रस्तुति गुरुवार को चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है |
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत प्रभावी रचना...नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  3. अति सुंदर रचना...शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके विचार फली भूत हों, यही कामना है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आपका-

    उत्तर देंहटाएं

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