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शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

"बदल रहा है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हर रोज रंग अपना, मौसम बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

सूरज नियम से उगता,
चन्दा नियम से आता।
कल-कल निनाद करता,
झरना ग़ज़ल सुनाता।
पतझड़ के बाद अपना, उपवन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

उड़ उड़के आ रहे हैं,
पंछी खुले गगन में।
परदेशियों ने डेरा,
डाला हुआ चमन में।
आसन वही पुराना, शासन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

महफिल में आ गये हैं,
नर्तक नये-नवेले।
बेजान हैं तराने,
शब्दों के हैं झमेले।
हैरत में है ज़माना, दामन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।

6 टिप्‍पणियां:

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