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शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

"आसमान में बादल छाया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मौसम ने है बहुत रुलाया।
आसमान में बादल छाया।।
 
सूरज ने अवकाश लिया है,
सर्दी फिर से वापिस आयी।
पीछा नहीं छोड़ती अब भी,
कम्बल-लोई और रजायी।
ऊनी कपड़ें में भी अब तो,  
काँप रही ठिठुरन से काया।
आसमान में बादल छाया।।
बिजली करती आँख-मिचौली,
हीटर पड़े हुए हैं ठण्डे।
बाजारों से लकड़ी गायब,
नहीं सुलभ हैं उपले-कण्डे।
चमक-चमककर, कड़क-कड़ककर,  
घनचपला ने बहुत डराया।
आसमान में बादल छाया।।
 
अभी बहुत कुहरा आता है,
वासन्ती परिवेश नहीं है।
गर्मी नहीं अभी धूप में पूरी,
यौवन चढ़ा दिनेश नहीं है।  
मजबूरी में दादा जी ने,
तसले में अलाव सुलगाया।
आसमान में बादल छाया।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (1-2-2014) "मधुमास" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1510 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर चित्रण...
    सुन्दर रचना....
    http://mauryareena.blogspot.in/
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिजली करती आँख-मिचौली,
    हीटर पड़े हुए हैं ठण्डे।
    बाजारों से लकड़ी गायब,
    नहीं सुलभ हैं उपले-कण्डे।
    चमक-चमककर, कड़क-कड़ककर,
    घनचपला ने बहुत डराया।
    आसमान में बादल छाया।।

    सुन्दर बिम्ब सांगीतिक स्वर हैं रचना के।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कल 02/02/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  5. bahut sundar geet hai thand ka pura anand ....... :) pyara geet badhai aapko

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर हमेशा की तरह

    उत्तर देंहटाएं
  7. ऐसे मौसम में आसमान खुला रहे, वही अच्छा।

    उत्तर देंहटाएं

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