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सोमवार, 6 जनवरी 2014

"ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उच्चारण
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।

राह सुनसान थी, आगे बढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

पीछे मुड़ के कभी मैंने देखा नही,
धन के आगे कभी माथा टेका नही,
शब्द कमजोर थे, शेर गढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

भावनाओं में जीता रहा रात-दिन,
वेदनाओं को पीता रहा रात-दिन,
ज़िन्दग़ी की सलीबों पे चढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

मैंने हँसकर लिया, आपने जो दिया,
मैंने अमृत समझकर, गरल को पिया,
बेसुरी फूटी ढपली को मढ़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

कुछ ने सनकी कहा, कुछ ने पागल कहा,
कुछ ने छागल कहा, कुछ ने बादल कहा,
रीतियों और रिवाजों से लड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

आपने जो लिखाया, वही लिख दिया,
शब्द जो भी सुझाया, वही रख दिया,
मंजु-माला में कंकड़ ही जड़ता रहा।
वन्दना वीणा-पाणि की पढ़ता रहा।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपको ये जानकर अत्यधिक प्रसन्नता होगी की ब्लॉग जगत में एक नया ब्लॉग शुरू हुआ है। जिसका नाम It happens...(Lalit Chahar) है। जिसमें आपके सहयोग की आवश्यकता है। सादर ..... आभार।।

    Blog Url :: http://lalitchahar.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी तो हर रचना लाजवाब होती है :)

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थक प्रस्तुति हेतु बधाई .नव वर्ष के हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर व् सार्थक अभिव्यक्ति .नव वर्ष २०१४ की हार्दिक शुभकामनायें .

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर
    जयंति वीणा वादिनी

    उत्तर देंहटाएं

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