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शनिवार, 4 जनवरी 2014

"कुहरे की फुहार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कुहरे की फुहार से,
ठहर गया जन-जीवन।
शीत की मार से,
काँप रहा मन और तन।

--
माता जी लेटी हैं,
ओढ़कर रजाई।
काका ने तसले में,
लकड़ियाँ सुलगाई। 

--
गलियाँ हैं सूनी,
सड़कें वीरान हैं।
टोपों से ढके हुए,
लोगों के कान हैं। 

--
खाने में खिचड़ी,
मटर का पुलाव है।
जगह-जगह जल रहा,
आग का अलाव है। 

--
राजनीतिक भिक्षु,
हुो रहे बेचैन हैं।
मत के जुगाड़ में,
चौकन्ने नैन हैं।

--
विलम्बित उड़ाने हैं,
ट्रेन सभी लेट हैं।
ठण्डक से दिनचर्या,
हुई मटियामेट है।

--
मँहगाई की आग में,
सेंकते रहो बदन।
कुहरे की फुहार से,
ठहर गया जन-जीवन...। 

10 टिप्‍पणियां:

  1. हर जाड़े में ऐसा ही होता...

    मँहगाई की आग में,
    सेंकते रहो बदन।
    कुहरे की फुहार से,
    ठहर गया जन-जीवन

    ठण्ड के मौसम की गर्म गर्म रचना, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. काफी उम्दा प्रस्तुति.....

    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (05-01-2014) को "तकलीफ जिंदगी है...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1483" पर भी रहेगी...!!!

    आपको नव वर्ष की ढेरो-ढेरो शुभकामनाएँ...!!

    - मिश्रा राहुल

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुहरे की फुहार से,
    ठहर गया जन-जीवन।
    शीत की मार से,
    काँप रहा मन और तन।
    --
    माता जी लेटी हैं,
    ओढ़कर रजाई।
    काका ने तसले में,
    लकड़ियाँ सुलगाई।
    --सुन्दर शब्द- चित्र बे -ईमान मौसम का

    उत्तर देंहटाएं
  4. कुहरे की फुहार से,
    ठहर गया जन-जीवन।
    शीत की मार से,
    काँप रहा मन और तन।
    --
    माता जी लेटी हैं,
    ओढ़कर रजाई।
    काका ने तसले में,
    लकड़ियाँ सुलगाई।


    गलियाँ हैं सूनी,
    सड़कें वीरान हैं।
    टोपों से ढके हुए,
    लोगों के कान हैं।

    खाने में खिचड़ी,
    मटर का पुलाव है।
    जगह-जगह जल रहा,
    आग का अलाव है।
    --
    राजनीतिक भिक्षु,
    हुो रहे बेचैन हैं।
    मत के जुगाड़ में,
    चौकन्ने नैन हैं।

    --सुन्दर शब्द- चित्र बे -ईमान मौसम का

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति -
    आभार आपका-
    सादर -

    उत्तर देंहटाएं

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