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शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

"गधे बन गये अरबी घोड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


चाँदी की थाली में, सोने की चम्मच से खाने वाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

नाम बड़े हैं दर्शन थोड़े,
गधे बन गये अरबी घोड़े,
एसी में अय्यासी करते,
ये घोड़े हैं बहुत निगोड़े,
खादी की केंचुलिया पहने, बैठे विषधर काले-काले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

कहलाते थे जो नालायक,
वो बन बैठे आज विधायक,
सौदों में खा रहे दलाली,
ये स्वदेश के भाग्यविनायक,
लूट रहे भोली जनता को, बनकर जन-गण के रखवाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

भावनाओं को ये भड़काते,
मुद्दों को भरपूर भुनाते,
कैसे क़ायम रहे एकता,
चाल दोहरी ये अपनाते,
सत्ता पर क़बिज़ रहने को, चलते भाँति-भाँति की चाले।
महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।।

5 टिप्‍पणियां:

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