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मंगलवार, 11 अगस्त 2015

गीत "जिन्दा उसूल हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

अब भी हमारे गाँव में जिन्दा उसूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।


परिवार हमने कुलजहान मान लिया है

दुश्मन को दोस्त जैसा सदा मान दिया है
बस हमसे बार-बार हुई ये ही भूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।


साबुन से धोया हमने गधों को हजार बार

लेकिन कभी न आया उनमें गाय सा निखार
कचनार के संग-साथ में रहते बबूल हैं।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।


हम जोर-जुल्म के न कभी आगे झुकेंगे

तूफान-आँधियों में भी कभी न रुकेंगे
खारों को हमने मान लिया सिर्फ फूल है।
गर प्यार से मिले तो जहर भी कुबूल है।।

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