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शनिवार, 8 अगस्त 2015

अकविता ‘‘उल्लू और गदहे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उल्लू
तो
था ही उल्लू
और
गधा,
कल तक था
भार से लदा,

लेकिन
अब दोनों की,
किस्मत निखर गई है
सारे उल्लुओं
और
गदहों की
जिन्दगी सँवर गई है

जंगल में,
अब इनकी ही तो 
सरकार है!
जंगल की संसद में
उल्लुओं
और
गदहों की ही तो भरमार है!!

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