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गुरुवार, 6 अगस्त 2015

गीत "बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिन्दगी चल रही चिमनियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

लाडलों के लिए पूरे घर-बार हैं,
लाडली के लिए संकुचित द्वार हैं,
भाग्य इनको मिला कंघियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

रंक माता पिता की हैं मुश्किल बढ़ी,
ताड़ सी पुत्रियों की हैं चिन्ता बड़ी,
भूख वर की बढ़ी भेड़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

शादियों में बहुत माँग जर की बढ़ी,
नोट की गड्डियों पर नजर हैं गड़ी,
रोग है बढ़ रहा कोढ़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

ये ही पीड़ा हृदय में रहेगी सदा,
लेखनी दर्द इनका लिखेगी सदा,
इनकी ससुराल है बेड़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

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