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शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

गीत "कब-कब मैं पागल होता हूँ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

त्योहारों की परम्परा में, दीन-धर्म को जो लाये,
प्रेम-प्रीत की गलियों में,  जो जम कर शोले भड़काये,
जब भाषण आग उगलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

कूड़ा-कचरा बीन-बीन, जो बालक रोजी कमा रहे,
पढ़ने-लिखने की आयु में,  जो अपना जीवन गँवा रहे,
जब बचपन आँखें मलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

दर्द-दर्द है जिसको होता,  वो ही तो उसको जाने,
पीड़ा का अहसास न जिसको,  वो क्या उसको पहचाने,
जब सर्प बाँह में पलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं, मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

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