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शनिवार, 15 अगस्त 2015

दोहे "आजादी का पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मिलकर आज मनाइए, आजादी का पर्व।
गौरवशाली दिवस पर, हम करते हैं गर्व।।
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आजादी का पर्व है, निष्ठा का त्यौहार।
किन्तु आस्था का यहाँ, खिसक रहा आधार।।
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वीर सपूतों ने दिया, जब अपना बलिदान।
उनके पुण्य-प्रताप का, आजादी प्रतिदान।।
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आजादी के आज तो, बदल गये हैं अर्थ।
उनको है स्वाधीनता, जो हैं आज समर्थ।।
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कैसी ये स्वाधीनता, होता आज मलाल।
जिनको मत अपना दिया, वो बन गये दलाल।।
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भूल गये इतिहास को, याद नहीं भूगोल।
प्रजातन्त्र से प्रजा अब, होती जाती गोल।
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आज शहादत का नहीं, कोई भी सम्मान।
जीवित सेनानियों का, होता है अपमान।
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जनता की सुनती नहीं, बहरी है सरकार।
उसके तो है भाग्य में, भाषण लच्छेदार।।

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