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बुधवार, 12 अगस्त 2015

"पैराडाइज पत्रिका में मेरे दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पैराडाइज पत्रिका में मेरे दोहे

मास जनवरी जा रहा, मन है बहुत उदास।
फिर भी सबको प्यार से, बुला रहा मधुमास।१।
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गेहूँ-सरसों फूलते, रहे सुगन्ध लुटाय।
मधुमक्खी-तितली-भ्रमर, खेतों में मँडराय।२।
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झड़बेरी पर छा गये, खट्टे-मीठे बेर।
करते हैं अठखेलियाँ, तीतर और बटेर।३।
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पतझड़ आया तो हुआ, नंगा-नंगा गात।
बसन्त अपने साथ में, लाया नूतन पात।४।
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मन को बहुत लुभा रहे, ये उपवन के फूल।
कितने प्यार-दुलार से, सुमन पालते शूल।५।
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गंगा जी में बह रहा, निर्मल-पावन नीर।
काँवड़ लेने जायेंगे, अब बहनों के बीर।६।
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जीवित माता-पिता की, करना सेवा आप।
मात-पिता को कभी भी, देना मत सन्ताप।७।
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दुनिया में सबसे बड़े, मात-पिता-आचार्य।
सबको जीवन के यही, सिखलाते हैं कार्य।८।

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