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रविवार, 23 अगस्त 2015

दोहे "थमे हुए जल में सदा, बन जाते शैवाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


छाया को देता नहीं, कण्टक वृक्ष खजूर।
जो हैं कुटिल स्वभाव के, रहना उनसे दूर।१।
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करते सदा परोक्ष में, इज्जत पर जो वार।
जब होते वो सामने, तब करते मनुहार।२।
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ज्यादा मीठे बोल में, होती झूठी प्रीत।
ऐसे लोगों से सदा, करो किनारा मीत।३।
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मिलते हैं संसार में, पग-पग पर आघात।
जाँच-परख कर कीजिए, साझा मन की बात।४।
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छल-फरेब का जगत में, बिछा हुआ है जाल।
पानी वाले दूध में, आता खूब उबाल।५।
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छोटी-छोटी बात पर, होना नहीं अधीर।
हरदम रहना चाहिए, धीर और गम्भीर।६।
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चरैवेति सिद्धान्त का, रखना हरदम ख्याल।
जिनमें नहीं प्रवाह है, सड़ जाते वो ताल।७।
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अभिमानी गिरि पर बहुत, आते हैं भूचाल।
थमे हुए जल में सदा, बन जाते शैवाल।८।
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धन-दौलत को पाय कर, मत करना अभिमान।
घर आये मेहमान का, करना मन से मान।९।
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कभी न करना कहीं भी, कोई लूट-खसोट
नीयत में लाना नहीं, अपनी कोई खोट।१०।
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दग़ाबाज-मक्कार का, रहता खाली हाथ।
श्रम से अर्जित द्रव्य ही, सदा निभाता साथ।११।

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