"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

रविवार, 2 अगस्त 2015

दोहे "उतना पानी दीजिए, जितनी जग को प्यास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नभ पर बादल छा रहे, पड़तीं सुखद फुहार।
छीँटे औ बौछार हैं, सावन का उपहार।।
--
भुवन भास्कर ने लिया, कुछ दिन का अवकाश।
मेघों से आछन्न है, पूरा ही आकाश।।
--
काँवड़ लेने चल पड़े, भक्त सभी हरद्वार।
देंगे गंगानीर का, शिवजी को उपहार।।
--
गूँज रहा आकाश में, हर-हर, बम-बम नाद।
छाया श्रद्धा-भाव का, भक्तों में उन्माद।।
--
वर्षा लाती हर्ष को, देती कहीं विषाद।
नदिया तट पर सोचता, नौका लिए निषाद।।
--
जब सूखे थे खेत-वन, निर्मल था आकाश।
अब अतिवर्षा देखकर, मन हो गया उदास।।
--
इन्द्रदेवता आपसे, बस इतनी अरदास।
उतना पानी दीजिए, जितनी जग को प्यास।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails