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सोमवार, 17 अगस्त 2015

‘‘तीजो का आया त्यौहार, चलो झूला झूलेंगे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सावन की आई बहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

बागों में कुहु-कुहु, बोले कोयलिया,
जियरा में अगन लगाये बदलिया,
गायेंगे मेघ-मल्हार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी है फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
 
मेंहदी रचाओ और गजरा सजाओ,
कजरारे नयनों में, कजरा लगाओ,
चूनर को लेना सँवार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
 
खेतों में धनवा की सोंधी महक है,
तालों में पनिया की चंचल चहक है,
शीतल चलत है बयार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।
 
हरी-हरी धरती, हरी-हरी चुडियाँ,
चहकीं हैं बुढ़िया, महकी हैं कुड़ियाँ,
तीजो का आया त्यौहार, चलो झूला झूलेंगे।
पड़ने लगी हैं फुहार, चलो झूला झूलेंगे।।

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