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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

दोहे "नागपञ्चमी-हरेला, रक्षाबन्धन-तीज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


सावन होता पाठकों, श्रवण-मनन का मास।
बढ़े धर्म की बेल नित, हो अधर्म का नाश।।
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नागपञ्चमी-हरेला, रक्षाबन्धन-तीज।
घर-घर में बनते सभी, व्यञ्जन बहुत लजीज।।
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आते श्रावण मास में, उत्सव औत्यौहार।
पर्वों में ही निहित है, जीवन का आधार।।
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दूध पिलाने नाग को, चले आज नर-नार।
शंकर के दरबार में, लम्बी लगी कतार।।
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नाग कालिया को दिया श्रीकृष्ण ने नाथ।
श्री कृष्ण ने कर दिया, ब्रज का लोक सनाथ।।
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पैनी रखिए नज़र को, शिक्षा देते सर्प।
गुणग्राही बन जाइए, छोड़ दीजिए दर्प।।
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कुदरत का हा नियम ये, भय बिन होय न प्रीत।
पूजा करते नाग की, होकर सब भयभीत।।
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भक्तों की टोली चली, शंकर जी के द्वार।
काँवड़ काँधे पर धरे, करते जय-जयकार।।
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गूँजा है परिवेश में, हर-हर-बम-बम नाद।
श्रावण में सब कर रहे, शिव-शम्भू को याद।।

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