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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

ग़ज़ल "सुहाना प्यार का साया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नहीं किस्मत में फूलों की, सुहाना प्यार का साया
मिला मौका जिसे जब भी,  मसलने लग गया काया

कली ने मुस्करा के जब, प्रणय के गीत को गाया
अधर को चूमने उसके, भ्रमर उड़कर चला आया

अज़ब हैं खेल दुनिया के, अजब दस्तूर हैं उसके
वहाँ करते हैं गद्दारी, जहाँ का रिज़क है खाया

सभी को बाँटते खुशियाँ, मगर तकदीर खोटी है
सम्भाला होश है जबसे, मिली काँटों की है छाया

सभी हैं यार मतलब के. बड़ी ख़ुदगर्ज़ दुनिया है
दरिन्दों को गुलिस्ताँ में, रुपहला “रूप” है भाया

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