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मंगलवार, 4 अगस्त 2015

दोहे "आये हैं शैतान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

परमेश्वर के नाम पर, होते वाद-विवाद।
लेकिन संकट के समय, ईश्वर आता याद।।
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दम्भ और अभिमान में, मनवा रहता चूर।
लेकिन पग-पग पर मनुज, है कितना मजबूर।।
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कण-कण में जो रमा है, वो ही है भगवान।
मन्दिर-मस्जिद में उसे, खोज रहा नादान।।
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ईश्वर-अल्ला एक है, क्यों करते हो भेद।
क्यों मालिक के नाम पर, करते हो मतभेद।।
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फिरकों में बँटने लगा, अब तो सभ्य समाज।
पूजा और अजान भी, बना दिखावा आज।।
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कुछ ऐसे भी सन्त हैं, जो खल-कामी-दुष्ट।
कुटिल नहीं हो पायेंगे, जीवनभर सन्तुष्ट।।
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आये हैं ये धर्म के, बनकर ठेकेदार।
इनसे मैली हो गयी, गंगा जी की धार।।
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ओढ़ लबादा मनुज का, आये हैं शैतान।
रामनाम के नाम पर, बन बैठे धनवान।।

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