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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

ग़ज़लनुमा पेशकश "पढ़ना बहुत जरूरी है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

पढ़ना बहुत जरूरी है
लिखना तो मजबूरी है

वो ही खरे उतरते हैं
जिनकी निष्ठा पूरी है

नया ज़माना आया है
सत्संगों से दूरी है

जब हम मेहनत करते हैं
तब मिलती मजदूरी है

जीवन एक हक़ीकत़ है
सपना तो सिंदूरी है

होना होगा वो ही तो
रब की जो मंजूरी है

रिश्तों की अमराई में
रस्मों की दस्तूरी है

मछली जल में रहती है
फिर भी प्यास अधूरी है

“रूप” भले ही ढल जाये
पर क़ायम मग़रूरी है

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