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गुरुवार, 1 नवंबर 2018

दोहे "घर में बहुत अभाव" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मनमोहक सबको लगें, झालर-बन्दनवार।
जगमग करती रौशनी, सजे हुए बाजार।।
--
मन सबका ललचा रहे, काजू औ’ बादाम।
लेकिन श्रमिक-किसान की, नहीं जेब में दाम।।
--
धनवानों के है लिए, दीपों का त्यौहार।
जुआ खेलते शान से, जीत रहे या हार।।
--
बाजारों में धान का, गिरा हुआ है भाव।
धरती के भगवान के, घर में बहुत अभाव।।
--
जो दुनिया को पालता, बदतर उसका हाल।
औने-पौने दाम में, उसका बिकता माल।।
--
चाहे अपने देश में, कोई हो सरदार।
नहीं किसानों का बना, अब तक पैरोकार।।
--
जितने जनसेवक हुए, निकले सब मक्कार।
करते हैं मत के लिए, भाषण लच्छेदार।।
--
उनकी है दीपावली, उनके सब त्योहार।
लेकिन जनता झेलती, महँगाई की मार।।

1 टिप्पणी:

  1. अप्रतिम भावबोध करुणा और प्रखर व्यंग्य से सजी अर्थ गर्भित रचना शास्त्रीजी की । आप भी पढ़िए :


    मनमोहक सबको लगें, झालर-बन्दनवार।
    जगमग करती रौशनी, सजे हुए बाजार।।
    --
    मन सबका ललचा रहे, काजू औ’ बादाम।
    लेकिन श्रमिक-किसान की, नहीं जेब में दाम।।
    --
    धनवानों के है लिए, दीपों का त्यौहार।
    जुआ खेलते शान से, जीत रहे या हार।।
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    बाजारों में धान का, गिरा हुआ है भाव।
    धरती के भगवान के, घर में बहुत अभाव।।
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    जो दुनिया को पालता, बदतर उसका हाल।
    औने-पौने दाम में, उसका बिकता माल।।
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    चाहे अपने देश में, कोई हो सरदार।
    नहीं किसानों का बना, अब तक पैरोकार।।
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    जितने जनसेवक हुए, निकले सब मक्कार।
    करते हैं मत के लिए, भाषण लच्छेदार।।
    --
    उनकी है दीपावली, उनके सब त्योहार।
    लेकिन जनता झेलती, महँगाई की मार।।
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