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रविवार, 11 नवंबर 2018

दोहे "छठ माँ का उद्घोष" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छठपूजा का आ गया, फिर पावन त्यौहार।
माता जन-गण के हरो, अब तो सभी विकार।।

लोग छोड़कर आ गये, अपने-अपने नीड़।
सरिताओं के तीर पर, लगी हुई है भीड़।।

अस्तांचल की ओर जब, रवि करता प्रस्थान।
छठ पूजा पर अर्घ्य तब, देता हिन्दुस्थान।।

परम्पराओं पर टिका, सारा कारोबार।
मान्यताओं में है छिपा, जीवन का सब सार।।

षष्टी मइया सभी का, करती बेड़ा पार।
माता ही सन्तान को, करती प्यार अपार।।

छठपूजा के दिवस पर, कर लेना उपवास।
अन्तर्मन से कीजिए, माता की अरदास।।

उदित-अस्त रवि को सदा, अर्घ्य चढ़ाना नित्य।
देता है जड़-जगत को, नवजीवन आदित्य।।

कठिन तपस्या के लिए, छठ का है त्यौहार।
व्रत पूरा करके करो, ग्रहण शुद्ध आहार।।

पूर्वांचल से हो गया, छठ माँ का उद्घोष।
दुनियाभर में किसी का, रहे न खाली कोष।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. छठ के महत्त्व और पर्व को बाखूबी बयान करते सुन्दर दोहे ...
    आपको छठ के पर्व की बधाई ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. सात्विक भाव की प्रांजल छट दोहावली :

    परम्पराओं पर टिका, सारा कारोबार।
    मान्यताओं में है छिपा, जीवन का सब सार।।
    editplatter05.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. जी नमस्ते,
    "पाठकों की पसंद" के अंतर्गत हमारी विशेष अतिथि आदरणीया साधना जी ने आपकी रचना पसंद की है।
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १६ नवंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पावन त्योहार अनुरूप पावन दोहे।

    उत्तर देंहटाएं

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