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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

गीत "नारी की कथा-व्यथा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अपने छोटे से जीवन में 
कितने सपने देखे मन में

इठलाना-बलखाना सीखा 
हँसना और हँसाना सीखा 
सखियों के संग झूला-झूला 
मैंने इस प्यारे मधुबन में
कितने सपने देखे मन में 

भाँति-भाँति के सुमन खिले थे 
आपस में सब हिले-मिले थे 
प्यार-दुलार दिया था सबने 
बचपन बीता इस गुलशन में 
कितने सपने देखे मन में

एक समय ऐसा भी आया 
जब मेरा यौवन गदराया 
विदा किया बाबुल ने मुझको 
भेज दिया अनजाने वन में 
कितने सपने देखे मन में

मिला मुझे अब नया बसेरा 
नयी शाम थी नया सवेरा 
सारे नये-नये अनुभव थे 
अनजाने से इस आँगन में 
कितने सपने देखे मन में

कुछ दिन बाद चमन फिर महका 
बिटिया आयी, जीवन चहका चहका  
लेकिन करनी पड़ी विदाई 
भेज दिया नूतन उपवन में 
कितने सपने देखे मन में
नारी की तो कथा यही है 
आदि काल से प्रथा रही है 
पली कहीं तो, फली कहीं है
दुनिया के उन्मुक्त गगन में 
कितने सपने देखे मन में

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (28-11-2018) को "नारी की कथा-व्यथा" (चर्चा अंक-3169) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन रचना आदरणीय 👌
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. नारी की तो कथा यही है
    आदि काल से प्रथा रही है
    पली कहीं तो, फली कहीं है
    दुनिया के उन्मुक्त गगन में
    कितने सपने देखे मन में
    नारी का एक चित्र बांधती प्यारी प्यारी सी ये रचना
    veerusa.blogspot.com
    veeruji05.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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