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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

दोहे "सन्त और बलवन्त" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीन-हीन थोथे वचन, कभी न बोलो मित्र।
वाणी से होता प्रकट, अच्छा-बुरा चरित्र।।

कटुक वचन के कोप से, हो जाते सब क्रुद्ध।
वाणी में रस हो अगर, टल जाते हैं युद्ध।।

जो विनम्र होकर पढ़ें, कहलाते वो छात्र।
जिनकी रसना रसभरी, होते वही सुपात्र।।

जो गुरु का आदर करें, वो हैं सच्चे शिष्य।
अभिमानी शागिर्द का, बनता नहीं भविष्य।।

जन्मजात होते नहीं, सन्त और बलवन्त।
बन जाते गुरु कृपा से, मूरख भी गुणवन्त।।

1 टिप्पणी:

  1. गुरु दीप गुरुहि ज्योतिर गुरु अगास का सूर |

    अंतर गुरु प्रगास गहे होत अन्धेरा दूर || ५ ||
    भावार्थ : - गुरु दीपक स्वरूप होते हैं गुरु ही उसकी ज्योत्स्ना होते हैं गुरु आकाश के सूर्य समदृश्य होते हैं | गुरु के ज्ञान प्रकाश ग्रहण कर अंतरतम अन्धकार से विमुक्त हो जाता है |

    उत्तर देंहटाएं

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