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बुधवार, 21 नवंबर 2018

गीत "राम के ही देश में, राम बेकरार है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

है नशा चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

हो गये उलट-पलट, वायदे समाज के,
दीमकों ने चाट लिए, कायदे रिवाज़ के,
प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

अंजुमन पे आज, सारा तन्त्र है टिका हुआ,
आज उसी वाटिका का, हर सुमन बिका हुआ,
गुल गुलाम बन गये, खार पर निखार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
राम के ही देश में, राम बेकरार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 22.11.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3163 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर आदरणीय 👌

    उत्तर देंहटाएं
  3. झूठ के प्रभाव से, सत्य है डरा हुआ,
    बेबसी के भाव से, आदमी मरा हुआ,
    राम के ही देश में, राम बेकरार है।
    तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।
    सशक्त रचना है शास्त्री जी की।

    veerusa.blogspot.com
    veerujan.blogspot.com
    राम तो मरा नहीं है आदमी मरा हुआ ,
    सत्य को नकारने पे इस कदर अड़ा हुआ ,
    चोर -चोर खुद ही करे चोर बे-दयार है।

    उत्तर देंहटाएं

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