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सोमवार, 26 नवंबर 2018

ग़ज़ल "जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है 
हाड़ धुनने का काम जारी है
पेट भरता था जो जमाने का
उसकी खाली पड़ी पिटारी है
साहुकारों का कर्ज बाकी है
खत्म होती नहीं उधारी है
कल तलक जो शिकार होता था
आज खुद बन गया शिकारी है

आज जीवन में मारामारी है
जान अपनी सभी को प्यारी है
जब से गुलशन का वो बना माली
भूल बैठा गुलों से यारी है
ताजपोशी हुई है जिस दिन से
“रूप” पर छा गयी खुमारी है

5 टिप्‍पणियां:


  1. बढ़िया भाव अभिव्यक्ति शास्त्री जी की :

    जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है
    हाड़ धुनने का काम जारी है
    क्या करें जीने की लाचारी है ,
    ये आदतन ही खेल ज़ारी है।

    veerujan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

  2. बढ़िया भाव अभिव्यक्ति शास्त्री जी की :

    जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है
    हाड़ धुनने का काम जारी है
    क्या करें जीने की लाचारी है ,
    ये आदतन ही खेल ज़ारी है।
    उम्र सारी ही यूं गुज़ारी है ,
    कोई तो है जो हम पे तारी है।

    veerujan.blogspot.com
    kabirakhadasaraimen.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना 👌👌

    जिन्दगी जिन्दगी पे भारी है
    हाड़ धुनने का काम जारी है
    पेट भरता था जो जमाने का
    उसकी खाली पड़ी पिटारी है....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर शास्त्री जी!
    आज भी कोई होरी गोदान की अधूरी आस लेकर मर रहा है और उसका बेटा गोबर विरासत में उसके मिले क़र्ज़ को चुकाने में अपनी ख्वाहिशों और अपने सपनों को चूर-चूर होते देख रहा है.
    चमन का हिफ़ाज़तदां जब सैयाद बन जाए तो परिंदों का क्या हश्र होगा, यह सब जानते हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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