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बुधवार, 7 नवंबर 2018

"आओ दीप जलायें हम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दीवाली पर आओ मिलकर,
नन्हें दीप जलायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

आओ स्वच्छता के नारे को
दुनिया में साकार करें
चीन देश की चीजों को
हम कभी नहीं स्वीकार करें
छोड़ साज-संगीत विदेशी
देशी साज बजायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

कंकरीट की खेती से
धरती को हमें बचाना है
खेतों में श्रम करके हमको
गेहूँ-धान उगाना है
अपने खेतों की मेढ़ों पर
आओ वृक्ष लगायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

मजहब के ठेकेदारों की
बन्द दुकानें करनी हैं
भाईचारे की भारत में
नयी नींव अब धरनी हैं
लालन-पालन करने वाली
माँ की महिमा गायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

असली घर में नकली पौधों
का, अब कोई काम न हो
कुटिया में महलों में अपने
कहीं छलकते जाम न हो
बन्द करो मयखाने सारे
शासन को चेतायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

देव संस्कति को अपनाओ
रक्ष सभ्यता को छोड़ो
 राम और रहमान एक हैं
उनसे  ही नाता जोड़ो
भेद-भाव, अलगाववाद का
वातावरण मिटायें हम
घर-आँगन को रंगोली से,
मिलकर खूब सजायें हम

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