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सोमवार, 5 नवंबर 2018

गीत "इस धरा को रौशनी से जगमगायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

एक दीपक तुम जलाओएक दीपक हम जलायें।
आओ मिलकर इस धरा कोरौशनी से जगमगायें।।

आज दूषित सभ्यता कीचल रहीं हैं आँधियाँ,
आग में अलगाव की तोजल रही हैं वादियाँ,
नफरतों को दूर करकेएकता की धुन बजायें।
आओ मिलकर इस धरा कोरौशनी से जगमगायें।।

वतन में गन्दी सियासतसेंकती हैं रोटियाँ,
स्वप्न ज़न्नत के दिखाकरनोचती हैं बोटियाँ,
सूखते परिवेश में हमनेह की फसलें उगायें।
आओ मिलकर इस धरा कोरौशनी से जगमगायें।।

अन्न-जल खा जिस चमन में, हम पले हैं,
थामकर अँगुली वतन की हम चले हैं,
आओ श्रद्धा-भाव से उस मातृभू को सिर नवायें।
आओ मिलकर इस धरा कोरौशनी से जगमगायें।।

जगत में अस्तित्व है जिससे हमारा,
सभी का होता जहाँ पर है गुजारा,
शौर्य के, अभिमान के हम गीत आओ गुनगुनायें।
आओ मिलकर इस धरा कोरौशनी से जगमगायें।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर नेक कामना लिए सामयिक प्रस्तुति
    आपको धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं

  2. एक दीपक तुम जलाओ, एक दीपक हम जलायें।
    आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

    आज दूषित सभ्यता की, चल रहीं हैं आँधियाँ,
    आग में अलगाव की तो, जल रही हैं वादियाँ,
    नफरतों को दूर करके, एकता की धुन बजायें।
    आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

    वतन में गन्दी सियासत, सेंकती हैं रोटियाँ,
    स्वप्न ज़न्नत के दिखाकर, नोचती हैं बोटियाँ,
    सूखते परिवेश में हम, नेह की फसलें उगायें।
    आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

    अन्न-जल खा जिस चमन में, हम पले हैं,
    थामकर अँगुली वतन की हम चले हैं,
    आओ श्रद्धा-भाव से उस मातृभू को सिर नवायें।
    आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।

    जगत में अस्तित्व है जिससे हमारा,
    सभी का होता जहाँ पर है गुजारा,
    शौर्य के, अभिमान के हम गीत आओ गुनगुनायें।
    आओ मिलकर इस धरा को, रौशनी से जगमगायें।।
    राजनीतिक झरबेरियों की चुभन को उकेरती राष्ट्र प्रेम से भारत धर्मी विचार और स्पंदन की रचना बेहतरीन लाजावाब शास्त्री जी की। बधाई चर्चा मंच उत्सवी सप्ताह की।
    veeruji05.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं

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