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शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

दोहे "अनोखी गन्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
चाहे कवितायें लिखो, चाहे लिखो निबन्ध।
भावनाओं का चाहिए, दोनों में सम्बन्ध।।

यादों में आने लगे, अगर अनोखी गन्ध।
समझो तब अजनबी से, हुआ नया अनुबन्ध।।

छोटा हो या हो बड़ा, या साझा परिवार।
ताल-मेल के साथ में, चलता है संसार।।

दनुज-मनुज के भेद का, हो कैसे अनुमान।
पग-पग पर इंसान का, डोल रहा ईमान।।

आज सत्य है हारता, झूठ रहा है जीत।
फैले चारों ओर हैं, मतलब वाले मीत।।

मत-मजहब का आजकल, सबको चढ़ा बुखार।
पण्डित-मुल्ला-पादरी, करते कारोबार।।

ठेकेदारों की हुई, पग-पग पर भरमार।
नौका राम-रहीम की, कौन करेगा पार।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. चाहे कवितायें लिखो, चाहे लिखो निबन्ध।
    भावनाओं का चाहिए, दोनों में सम्बन्ध।।
    अतिसुन्दर भाव अर्थ और बिम्ब की सशक्त दोहावली
    सत्श्रीअकाल
    satshriakaljio.blogspot.com
    kabirakhadabazarmein.blogspot.com
    veerusahab2017.blogspot.com
    veerujianand.blogspot.com
    चाहे मंदिर जप किये चाहे पढ़े कुरआन ,
    प्रेम प्रीत गुणज्ञान बिन किछु न चढ़ै परवान।

    उत्तर देंहटाएं

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