| गुरूकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर (हरद्वार) से मैं कई बार भाग कर घर आ जाता था। मगर पिता जी मुझे हर बार गुरूकुल छोड़ कर आ जाते थे। मैं अभी 4 दिन पहले ही तो गुरूकुल से भाग कर घर आया था। लेकिन पिता जी तो मानते ही नहीं थे । वे मुझे फिर ज्वालापुर गुरूकुल में लेकर चल दिये। सुबह 10 बजे मैं और पिता जी गुरूकुल पहुँच गये। संरक्षक जी ने पिता जी कहा- ‘‘इस बालक का पैर एक बार निकल गया है, यह फिर भाग जायेगा।’’ पिता जी ने संरक्षक जी से कहा-‘‘ अब मैंने इसे समझा दिया है। यह अब नही भागेगा।’’ मेरे मन में क्या चल रहा था। यह तो सिर्फ मैं ही जानता था। दो बातें उस समय मन में थीं कि यदि मना करूँगा तो पिता जी सबके सामने पीटेंगे। यदि पिता जी ने पीटा तो साथियों के सामने मेरा अपमान हो जायेगा। इसलिए मैं अपने मन की बात अपनी जुबान पर नही लाया और ऊपर से ऐसी मुद्रा बना ली, जैसे मैं यहाँ आकर बहुत खुश हूँ। थोड़ी देर पिता जी मेरे साथ ही रहे। भण्डार में दोपहर का भोजन करके वो वापिस लौट गये। शाम को 6 बजे की ट्रेन थी, लेकिन वो सीधी नजीबाबाद नही जाती थी। लक्सर बदली करनी पड़ती थी। वहाँ से रात को 10 बजे दूसरी ट्रेन मिलती थी। इधर मैं गुरूकुल में अपने साथियों से घुलने-मिलने का नाटक करने लगा। संरक्षक जी को भी पूरा विश्वास हो गया कि ये बालक अब गुरूकुल से नही भागेगा। शाम को जैसे ही साढ़े चार बजे कि मैं संरक्षक जी के पास गया और मैने उनसे कहा- ‘‘गुरू जी मैं कपड़े धोने ट्यूब-वैल पर जा रहा हूँ।’’ उन्होंने आज्ञा दे दी। मैंने गन्दे कपड़ों में एक झोला भी छिपाया हुआ था। अब तो जैसे ही ट्यूब-वैल पर गया तो वहाँ इक्का दुक्का ही लड्के थे, जो स्नान में मग्न थे। उनकी नजर जैसे ही बची, मैं रेल की लाइन-लाइन हो लिया। कपड़े झोले मे रख ही लिए थे।ज्वालापुर स्टेशन पर पहुँच कर देखा कि पिता जी एक बैंच पर बैठ कर रेलगाड़ी के आने का इंतजार कर रहे थे। मैं भी आस-पास ही छिप गया। जैसे ही रेल आयी-पिता जी डिब्बे में चढ़ गये। अब मैं भी उनके आगे वाले डिब्बे में रेल में सवार हो गया। लक्सर स्टेशन पर मैं जल्दी से उतर कर छिप गया और पिता जी पर नजर रखने लगा। कुद देर बाद वो स्टेशन की बैंच पर लेट गये और सो गये। अब मैं आराम से टिकट खिड़की पर गया और 30 नये पैसे का नजीबाबाद का टिकट ले लिया। रात को 10 बजे गाड़ी आयी। पिता जी तो लक्सर स्टेशन पर सो ही रहे थे। मैं रेल में बैठा और रात में साढ़े ग्यारह बजे नजीबाबाद आ गया। नजीबाबाद स्टेशन पर ही मैं भी प्लेटफार्म की एक बैंच पर सो गया। सुबह 6 बजे उठ कर मैं घर पहुँच गया। माता जी और नानी जी ने पूछा कि तेरे पिता जी कहाँ हैं? मैं क्या उत्तर देता। एक घण्टे बाद पिता जी जब घर आये तो नानी ने पूछा-‘‘रूपचन्द को गुरूकुल छोड़ आये।‘‘ पिता जी ने कहा-‘‘हाँ, बड़ा खुश था, अब उसका गुरूकुल में मन लग गया है।’’ तभी माता जी मेरा हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर लायीं और कहा-‘‘ये कौन है?’’ यह मेरी गुरूकुल की अन्तिम यात्रा थी। |
गुरुकुल की यादों से सुसजित बढ़िया प्रस्तुति....
जवाब देंहटाएंरोचक यात्रा !
जवाब देंहटाएंशुभकामनाएँ!
जय हो आपकी।
जवाब देंहटाएंबेहतरीन तरीके से प्रस्तुत की आपने गुरूकुल की आखिरी यात्रा का विवरण।
जवाब देंहटाएंरोचक वृतांत.
जवाब देंहटाएंha ha ha acha hua aap bhaag aaye warna aap itne mahaan kaise bante jitne aaj hain hum sab ke liye.....
जवाब देंहटाएंbahut hi sundar prastuti... sundar chitra dekhkar bahut achha laga..
जवाब देंहटाएंवाह बढिया संस्मरण है। पिताजी को गच्चा दे दिया।
जवाब देंहटाएंरोचक वृतांत|
जवाब देंहटाएंमतलब पूरे शैतान थे आप्………………रोचक संस्मरण्।
जवाब देंहटाएंआपका यह कारनामा ताऊ डाट इन पर आपके परिचयनामा मे पढ चुके हैं.:)
जवाब देंहटाएंरामराम.
बहुत सुंदर।
जवाब देंहटाएंअब भले ही पढ कर हंसी आती हो पर उस समय कैसी मनस्थिति रही होगी
ऐसी यादें गुदगुदाती रहती हैं ...
जवाब देंहटाएंरोचक संस्मरण। विजयदशमी की शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंरोचक संस्मरण। ... आभार
जवाब देंहटाएंविजय पर्व "विजयादशमी" पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनायें
संस्मरण बहुत अच्छा रहा |विजय दशमी पर आपको सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं |
जवाब देंहटाएंआशा
आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।
जवाब देंहटाएंविजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
जवाब देंहटाएंनवीन सी. चतुर्वेदी
अपनी यूनिवर्सिटी भी खुद बनानी चाहिए...लेखक और कवि किसी विद्यालय में नहीं बनाये जाते...
जवाब देंहटाएंaapka sanmaran padhkar apne gurukul ke dino ki yadf aa gayi.
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