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सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

"धरा के रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 सभी हैं रंग फीके से,
धरा के रंग के आगे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

चलाई कूचियाँ अपनी,
सजाया कल्पनाओं को।
लिए हैं रंग कुदरत से,
बनाया अल्पनाओं को।
बुनी चादर जुलाहों ने,
लिए रंगीन से धागे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

उकेरे शब्द कवियों ने,
किया साहित्य का संगम।
पहाड़ों के शिखर से,
हो रहा धाराओं का उदगम।
लगा ऐसा कि जैसे,
मिल गये मोती बिना माँगे।
इन्हीं को देखकर सोये हुए,
अनुभाव हैं जागे।

21 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर सजे धरा के रंग!
    अनुभावों को मिली तरंग!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सभी हैं रंग फीके से,
    धरा के रंग के आगे।..बहुत सुन्दर..बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर कविता. खूबसूरत भावाभिव्यक्ति.

    आपकी दो पुस्तकें प्रकाशन की दहलीज़ तक पहुँच गयी हैं, यह जानकार बहुत उत्साहित हूँ उन्हें पढ़ने के लिये. प्रकाशित होने पर सूचना अवश्य दें.

    बधाई और शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  4. चलाई कूचियाँ अपनी,
    सजाया कल्पनाओं को।
    लिए हैं रंग कुदरत से,
    बनाया अल्पनाओं को।

    अति सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  5. धरा के रंग से ही तो हर रंग है
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. धरा के रंग से ही तो हर रंग है
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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