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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

"तीन मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

कुटिलता के भाव को पहचानते हैं,
शत्रुता दिल में नहीं हम ठानते हैं।
वो बहुत खुलकर चलाते बाण अपने,
किन्तु हम चुपचाप सहना जानते हैं।।

हम सुमन के हैं हितैषी, गन्ध को पहचानते हैं,
इसलिए हमसे कुटिल-काँटे, लड़ाई ठानते हैं।
छेदते हैं जो सुकोमल पुष्प का नाजुक बदन,
ठोकरों से हम उन्हें, हरदम कुचलना जानते हैं।।

बुज़दिली! दरियादिली को मत समझना,
दिल्लगी! दिल की लगी को मत समझना।
वक्त आने पर बहा देंगे रुधिर की धार को,
खड्ग को लाचार इतना मत समझना।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. कुटिलता के भाव को पहचानते हैं,
    शत्रुता दिल में नहीं हम ठानते हैं।
    वो बहुत खुलकर चलाते बाण अपने,
    किन्तु हम चुपचाप सहना जानते हैं।।.... ्वाह: तीनो बहुत सुन्दर हैं......आभार

    उत्तर देंहटाएं
  2. अह्हा! आनंद आ गया सर,
    सादर बधाईयाँ....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बुज़दिली! दरियादिली को मत समझना,
    दिल्लगी! दिल की लगी को मत समझना।
    वक्त आने पर बहा देंगे रुधिर की धार को,
    खड्ग को लाचार इतना मत समझना।।
    वाह जोशपूर्ण पंक्तियाँ.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपने अच्छा किया...जो समझा दिया...शराफत को कमजोरी समझने की भूल मत करना...

    उत्तर देंहटाएं
  5. गजब के तेवर.....
    सुंदर प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वो बहुत खुलकर चलाते बाण अपने,
    किन्तु हम चुपचाप सहना जानते हैं।।
    वाह,,क्या खूब कहा है सर ! जज्बात जबान पर आ ही जाते हैं , बधाईयाँ ..../

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर और लाजवाब पंक्तियाँ! हमेशा की तरह ज़बरदस्त प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं

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