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शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

"पचरंगी फूल खिलाओगे" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
आज एक पुरानी रचना को
आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ!

प्रियतम जब तुम आओगे तो,
संग बहारें लाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।

तुमको पाकर मन के उपवन,
बाग-बाग हो जायेंगे,
वीराने गुलशन में फिर से,
कली-सुमन मुस्कायेंगे,
जीवनरूपी बगिया में तुम,
ढंग निराले लाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।

अमराई में कोयल फिर से,
कुहुँक-कुहुँक कर गायेगी,
मुर्झाई अमियों में फिर से,
मस्त जवानी छायेगी,
अमलतास के पेड़ों पर,
पचरंगी फूल खिलाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।

आशा है आकर तुम मेरे,
कानों में रस घोलोगे,
सदियों का तुम मौन तोड़कर,
मीठे स्वर में बोलोगे,
अपनी साँसो के सम्बल से,
मुझको तुम सहलाओगे।
स्नेहिल रस बरसाओगे और
रंग फुहारें लाओगे।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुबसूरत प्यारी प्यारी रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  2. ... अंतिम पंक्तियाँ उद्वेलित कर देती हैं... सुन्दर गीत!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर और प्यारी सी प्रस्तुति है.
    मन को हर्साती हुई,सुन्दर भाव जगाती हुई.
    आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 31-10-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं

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