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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

" उपहार कहाँ से लाऊँ" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 कुछ लिखकर चुप बैठूँ, या अन्तर्मन में कुछ गाऊँ!
अपनी व्यथा-कथा को, कैसे जग को आज सुनाऊँ!!

गली-गली हैं चोर-लुटेरे, पथ में छाया अँधियारा,
कौन डगर से अपने घर को, सही-सलामत जाऊँ!

अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!

ग़ज़ल-गीत से मन भर जाता, पेट नहीं भरता है,
धन-दौलत की पौध खेत में, कैसे अब उपजाऊँ!

रिश्तेदारी नही रही अब, लोभी हुआ ज़माना,
वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ!

महफिल में सफेद कौओं को, रूप परोसा जाता,
बाज़ों से भोली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ!

19 टिप्‍पणियां:

  1. अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
    मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!
    रिश्तेदारी नही रही अब, लोभी हुआ ज़माना,
    वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ!
    बिल्कुल सही लिखा है आपने! सटीक पंक्तियाँ! ज़माना बदल गया है! सच्चाई को आपने बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है!

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ लिखकर चुप बैठूँ, या अन्तर्मन में कुछ गाऊँ!
    अपनी व्यथा-कथा को, कैसे जग को आज सुनाऊँ!!

    Wah...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    बहुत बहुत बधाई ||

    http://dineshkidillagi.blogspot.com/2011/10/blog-post_13.html

    उत्तर देंहटाएं
  4. रिश्तेदारी नही रही अब, लोभी हुआ ज़माना,
    वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ!

    महफिल में सफेद कौओं को, “रूप” परोसा जाता,
    बाज़ों से भोली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ

    आज के सच को बयाँ करती बहुत उत्तम अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
    मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!

    सटीक लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  6. अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
    मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!....सटीक लिखा है आपने..अभार..

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है

    उत्तर देंहटाएं
  8. रिश्तेदारी नहीं रही अब लोभी हुआ ज़माना
    वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ
    वाह वाह .... बहुत सुंदर प्रस्तुति सर बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती

    उत्तर देंहटाएं
  10. आज की सच्चाई बयाँ क्र दी आप की रचना ने ..
    गली-गली हैं चोर-लुटेरे, पथ में छाया अँधियारा,
    कौन डगर से अपने घर को, सही-सलामत जाऊँ!
    शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  11. आज के सच को बयाँ करती बहुत उत्तम अभिव्यक्ति। धन्यवाद|

    उत्तर देंहटाएं
  12. महफिल में सफेद कौओं को, “रूप” परोसा जाता,
    बाज़ों से भोली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ!

    बहुत ही सुन्दर बधाई हो आपको धन्यवाद आपका वर्तमान के स्तिथि को दिखने का

    उत्तर देंहटाएं
  13. ग़ज़ल-गीत से मन भर जाता, पेट नहीं भरता है,
    धन-दौलत की पौध खेत में, कैसे अब उपजाऊँ!


    stya vachan.....

    उत्तर देंहटाएं

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