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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

"बहती जल की धार निरन्तर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
उत्तर से दक्षिण को भू पर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

संसर्गों में जो भी आता,
तन-मन से पावन हो जाता,
अवगुण हो जाते छूमन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

सुनकर कलकल-छलछल के सुर,
आनन्दित हो जाता है उर,
निर्मल हो जाता है अन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

कुदरत का है साज अनोखा,
इसमें नही बनावट-धोखा,
चलता जाता चक्र निरन्तर।
बहती जल की धार निरन्तर।।

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहती जल की धार निरन्तर।।
    bahut sunder.......

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस निर्मल धारा के क्‍या कहने?

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर धार बहायी है सब पावन हो गया।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहती रहे ये निर्मल धारा निरंतर प्रतिपल....सुन्दर अभिव्यक्ति...आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  5. सरसंगों में जो भी आता,
    तन मन से पावन हो जाता
    अवगुण हो जाते छूमंतर
    बहती जल कि धारा निरंतर
    वाह वाह बहुत खूब सर हमेशा कि तरह एक और सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. डॉ. साहिब,

    यह कलकल धार बहा ले गई अपने साथ यादों के सफर में। इसी वर्ष जून-जुलाई में मैं माँ-पिताजी के साथ श्री बद्रीविशाल, केदारनाथ धाम होके आया हूँ।

    इस गीत ने यादें हरी कर दी.......यही इस रचना-शिल्प की सफलता भी है।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रकृति ने तो दिया ही है। पर थोड़ा दायित्व हमारा भी है इनकी पवित्रता बनाए रखने का।

    उत्तर देंहटाएं
  8. उत्कृष्ट और भावपूर्ण रचना,बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    बधाई स्वीकारें ||

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहते रहना ही जीवन है।
    सुंदर प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कुदरत का है साज अनोखा,
    इसमें नही बनावट-धोखा,
    चलता जाता चक्र निरन्तर।
    बहती जल की
    धार निरन्तर।।
    इस आनंदातिरेक में हम भी आपके संग है .मुबारक .जहां जहां प्रवाह है ,सर्क्युलेशन है वहां वहां जीवन है जड़ता मृत्यु है .मृत्यु फिर जीवन की ही निरंतरता है .जल का बहना जल स्रोतों से नेहा जैव स्तर पर भी स्वाभाविक है हमारा बहुलांश भी तो जल ही है .और सर्क्युलेशन जीवन का होना है .

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत पावन और सुन्दर जल धारा...

    उत्तर देंहटाएं
  13. "कुदरत का है साज अनोखा,
    इसमें नही बनावट-धोखा,
    चलता जाता चक्र निरन्तर।
    बहती जल की धार निरन्तर।।"

    कुदरत की पवित्रता हर सू नज़र आती है...
    यहाँ से वहां तक..
    कभी उत्तर से दक्षिण
    और कभी पूरब से पश्चिम तक.....!!

    और इस खूबसूरत रचना को पढ़ कर...

    "आनन्दित हो जाता है उर,
    निर्मल हो जाता है अन्तर।"

    उत्तर देंहटाएं
  14. ये जीवन भी इसी जल की धार की तरह बहता रहे तो क्या अच्छा हो ...

    उत्तर देंहटाएं

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