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मंगलवार, 10 सितंबर 2013

"हिन्दी वाले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अंग्रेजी भाषा के हम तो, खाने लगे निवाले हैं
खान-पान-परिधान विदेशी, फिर भी हिन्दी वाले हैं

अपनी गठरी कभी न खोली, उनके थाल खँगाल रहे
अपनी माता को दुत्कारा, उनकी माता पाल रहे
कुछ काले अंग्रेज, देश के बने हुए रखवाले हैं

वसुन्धरा-वन-खनिज और गो-गंगा को भी लील रहे
कृत्रिम मँहगाई फैलाकर, जनता का तन छील रहे
खादी की केंचुलिया पहने, डसते विषधर काले हैं

इनकी कारा में भारत माँ, रोती और बिलखती है
डरी और सहमी हिन्दी, कोने में पड़ी सिसकती है
हिन्दी को अपनी बिन्दी के, पड़े हुए अब लाले हैं

गाँधी तेरे बन्दर अब भी, अन्धे-गूँगे-बहरे हैं
दूध-दही की रखवाली पर, बिल्लो के अब पहरे हैं
मत पाकर धनवान बने, अब सियासती मतवाले हैं

13 टिप्‍पणियां:

  1. आज के हालात का सही जायजा लिया है शास्त्री जी ...
    नमस्कार ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जन जन के मन की बात लिख दी आदरणीय बहुत सही लिखा हार्दिक बधाई आपको

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही बेहतरीन और सटीक प्रस्तुति,आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - बुधवार - 11/09/2013 को
    आजादी पर आत्मचिन्तन - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः16 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  6. बहुत सटीक और सार्थक .....वर्तमान परिदृश्य का सत्य उजागर करती रचना ,महोदय...
    साभार......


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  7. बहुत सुंदर सटीक सार्थक अभिव्यक्ति,,
    गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाए !

    RECENT POST : समझ में आया बापू .

    उत्तर देंहटाएं
  8. सार्थक और सटीक बेहद गंभीर भी

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  9. अपनी गठरी कभी न खोली, उनके थाल खँगाल रहे.....क्या बात है शास्त्रीजी, अति-सुन्दर व्यंजना ...

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  10. ओए-होए ....एक दम सच लिख दिया है जी आपने

    उत्तर देंहटाएं

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