"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 14 सितंबर 2013

"चौदह सितम्बर-चौदह दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हिन्दी का दिन बन गया, जग में आज मखौल।
अंग्रेजी के भक्त अब, बजा रहे हैं ढोल।१।

हिन्दी-डे कहने लगे, अब तो नौकरशाह।
मन में इनके है नहीं, हिन्दी की कुछ चाह।२।

आन-बान-अभिमान का, मिटा रहे अस्तित्व।
मनमोहन की तान का, बिगड़ा हुआ घनत्व।३।

सूरज जब खाने लगे, खुद ही अपनी धूप।
अँधियारे को चीर कर, कैसे निखरे रूप।४।

स्वर-व्यंजन में रमा है, रूप और विज्ञान।
अपनी भाषा का करें, आओ हम गुणगान।५।

कभी न थमने पायेगी, सन्तों की आवाज।
मानस को श्रीराम की, पढ़ता रोज समाज।६।

युगों-युगों से चल रहे, खण्ड-काल और कल्प।
देवनागरी का नहीं, दूजा कोई विकल्प।७।

अपनी हिन्दी में निहित, जीवन का सब सार।
सन्तों के उपदेश पर, कर लो तनिक विचार।८।

काव्यशास्त्र में खूब है, छन्दों की भरमार।
सरस-सरल है तरल भी, अलंकार बौछार।९।

गद्य-पद्य से युक्त है, हिन्दी का साहित्य।
हिन्दी के परिवेश में, भरा हुआ लालित्य।१०।

उद्गम जिसमें प्रीत का, जीवन का है सार।
सारे जग को बाँटिए, हिन्दी का उपहार।११।

तुलसी-सूर-कबीर से, हुए न अब तक भक्त।
हिन्दी के उत्थान में, सदा रहे अनुरक्त।१२।

हिन्दी के प्रताप से, देश हुआ स्वाधीन।
फिर किस कारण से हुई, अपनी भाषा क्षीण।१३।

अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज।
अपनी भाषा में करे, जब हम अपने काज।१४।

24 टिप्‍पणियां:

  1. उद्गम जिसमें प्रीत का, जीवन का है सार।
    सारे जग को बाँटिए, हिन्दी का उपहार।११।

    सभी दोहे एक से बढकर एक..बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच्ची बात काही आपने दोहो के माध्यम से | सुंदर |

    उत्तर देंहटाएं
  3. नमस्कार आपकी यह रचना कल रविवार (15-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

    उत्तर देंहटाएं
  4. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-09-2013) के चर्चामंच - 1369 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  5. है जिसने हमको जन्म दिया,हम आज उसे क्या कहते है ,
    क्या यही हमारा राष्र्ट वाद ,जिसका पथ दर्शन करते है
    हे राष्ट्र स्वामिनी निराश्रिता,परिभाषा इसकी मत बदलो
    हिन्दी है भारत माँ की भाषा ,हिंदी को हिंदी रहने दो .....

    RECENT POST : बिखरे स्वर.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज के ब्लॉग बुलेटिन - हिंदी को प्रणाम पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

    उत्तर देंहटाएं
  7. घाव करे गंभीर...सारगर्भित दोहे...

    उत्तर देंहटाएं
  8. उद्गम जिसमें प्रीत का, जीवन का है सार।
    सारे जग को बाँटिए, हिन्दी का उपहार
    ....सुंदर-सटीक अभिव्यक्ति.....

    उत्तर देंहटाएं
  9. सूरज जब खाने लगे, खुद ही अपनी धूप।
    अँधियारे को चीर कर, कैसे निखरे रूप।४।

    गंभीर चिंतन ....बेहतरीन दोहे आदरणीय शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  10. गुरु जी प्रणाम
    खुबसूरत दोहावली ,चेतावनी और प्रेरणा देती हुई

    उत्तर देंहटाएं

  11. सूरज जब खाने लगे, खुद ही अपनी धूप।
    अँधियारे को चीर कर, कैसे निखरे रूप।४।

    स्वर-व्यंजन में रमा है, रूप और विज्ञान।
    अपनी भाषा का करें, आओ हम गुणगान।५।

    अपने प्यारे देश में, समझो तभी सुराज।
    अपनी भाषा में करे, जब हम अपने काज।१४।

    निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ,

    बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।

    ॐ शान्ति

    इतने शहरी हो गए लोगों के ज़ज्बात ,

    हिंदी भी करने लगी अंग्रेजी में बात।

    एक गजल कुछ ऐसी हो बिलकुल तेरे (हिंदी )जैसी हो ,

    मेरा चाहे कुछ भी हो तेरी कभी न हेटी हो।

    हिंदी की न हेटी हो।

    तेरी ,मेरी कभी न हो हिंदी तेरिमेरी हो।

    उत्तर देंहटाएं
  12. इसीलिए भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने कहा -


    निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल ,

    बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल।

    उत्तर देंहटाएं
  13. पहर वसन अंगरेजिया ,हिंदी करे विलाप ,

    अब अंग्रेजी सिमरनी जपिए प्रभुजी आप।

    पहर वसन अंगरेजिया उछले हिंदी गात ,

    नांच बलिए नांच ,देदे सबकू मात।

    अब अंग्रेजी हो गया हिंदी का सब गात ,

    अपनी हद कू भूलता देखो मानुस जात।

    उत्तर देंहटाएं
  14. हिन्दी हित कार्यरत समस्त जनों को शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  15. ब्लॉग प्रसारण लिंक 3 - चौदह सितम्बर पर चौदह दोहे मेरी हिंदी [ डॉ. रूपचंद शास्त्री 'मयंक']
    आदरणीय वाह वाह हिंदी दिवस पर क्या उत्तम दोहावली प्रस्तुत की है आपने हिंदी का क्या महत्व है कितनी सरल है सुन्दर है मीठी है के साथ साथ हिंदी के साथ साथ हो रहे दुर्व्यवहार को भी आपने सुन्दरता से परिभाषित किया है सुन्दर शिक्षाप्रद दोहावली हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

    उत्तर देंहटाएं
  16. bahut hi sundar dohawali ... hindi ke itihaas or vartaam me uske hrash ko paribhasit karti huyi .. sadar naman :)

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails